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डोबरमैन नाम के कुत्ते की पूँछ क्यों काट दी जाती है पूरी पोस्ट पढ़े iq level पर 

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    हेलो दोस्तों , iq level  की इस पोस्ट मे हम आपको यह बताएँगे की डोबरमैन नाम के कुत्ते की पूँछ क्यों काट दी जाती है , कुत्तो को पालनेवाले सोखिन लोग सिर्फ डोबरमैन की ही नहीं बल्कि , दूसरे 46 नस्ले के कुत्तो की पूँछ भी कटवा डालते है।  मगर वैज्ञानिक रूप से कुत्ते की पूँछ काटना जरुरी नहीं है और डोबरमैन की पूँछ इसलिए काट दी जाती है क्योकि वह दूसरे कुत्तो से जरा अलग दिखे या यू समाज लीजिए की वह एक अलग तरह का कुत्ता दिखे , लेकिन यदि इसी कारन से कुत्ते की पूँछ काट दी जाती है तो यह कारन ठीक नहीं है और उसके बाद कुत्ते की पूँछ को काटने के बाद कुछ तो बहाना चाहिए लोगो को बताने का इसलिए लोग झूठ बोलकर यह बताते है की कुत्ते को जाडियो के बीच टेढ़ी पूँछ वाले कुत्ते आसानी से नहीं निकल सकते इसलिए उनकी पूँछ काट दी और बोलते है की कुत्ते की पूँछ हरबार जाडियो के साथ घिसे उससे तो यही अच्छा है की पूँछ ही न हो।  सालो पहले यूरोपीय देश में उड़ने वाली बतकों का शिकार करने वाले शिकारी शिकार करने के बाद जमीन पर गिरी हुई बतक उठाने के लिए पालतू कुत्तो का इस्तेमाल करते थे और इन कुत्तो को बतक को लाने के लिए जाडियो में भेजते थे और वहीं से कुत्तो की पूँछ को काटने का शासन चला। 

    अभी तो शिकारी जैसी प्रवृतिया नहीं चल रही , लेकिन कई शहरी आवसोमे पालतू डोबरमैन कुत्ते रहते है ,इसीलिए ऐसे कुत्तो को बिना पूँछ के कर डालना उचित बात नहीं है। यदि शरीर में जिस अंग का उपयोग न हो तो कुदरत ही उसे नस्ट कर देता है , मनुष्यों के आदिमानव बन्दरोने अपनी पूछ गुमा डाली , और कुत्तो की पूँछ अभी भी  टिकी  हुई है क्योकि उसकी पूँछ कुत्ते की”वार्तालाप” का माध्यम है।  ख़ुशी , गभराहट ,उकसावा , और प्रस्तुत करने का भाव यह सब पूँछ के द्वारा कुत्ता व्यक्त करता है। डोबरमैन की पूँछ काट डालना यानि उसकी बोलने की शक्ति को ख़तम करदेने के बराबर है। 

दो बड़े शहरों के बीच के किलोमीटर कैसे निर्धारित किये जाती है ? जानिए iq level की इस पोस्ट में 


           भारत में ऐसे कई शहर है जिनका क्षेत्रफल बहुत  बड़ा है और ऐसे दो बड़े शहरों को जोड़ने के बाद उन दोनों शहरों  के बीच की दुरी कितनी है उसके लिए भारतमे किलोमीटर का इस्तेमाल होता है , और दोनों शहरो के बीच के अंतर को मापने के लिए दोनों शहरों के अंदर एक चोक्कस भौगोलिक बिंदु निर्धारित किया होता है।  और यह बिंदु हर एक गांव और सभी शहर में होता है। आपके गाओं की पोस्ट ऑफिस के प्रांगणमे ” stone zero ” लिखा हुआ कोई पत्थर मिले तो समज लेना की यही आपके गाओं का केन्द्रस्थान है।  जहाँ से दूसरे गाओं या फिर दूसरे शहर का अंतर मापा जाता है।  


दिल्ली का केन्द्रस्थान क्या है ? 

      राजधानी दिल्ली का केन्द्रस्थान वहाँ की पोस्टऑफिस नहीं बल्कि     ” राजघाट ” है , इसीलिए कई गाओं या शहरों में वहाँ की पोस्ट ऑफिस , बस स्टैंड  या फिर वहाँ की मुख्य बाजारे भी केन्द्रस्थान होती है।  इस तरह केन्द्रस्थान पसनद करने में ध्यान सिर्फ यह रखना पड़ता है की वह जगह गांव या शहर के बीचोबीच में हो।  

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     हम्हारे यहाँ ” stone  zero ” यानि की शहर से शहर के बीच दुरी मापने का यह फॉर्मूला अंग्रेज लेकर आये थे। भारत का सबसे पहला नक्शा बनाते वख्त सर्वेक्षकोने भारत का केंद्रबिंदु नागपुर को बताया था। नागपुर में  21.149850′ उत्तर अक्षांश और 79.080598’पूर्व रेखांश पर आये हुए स्थलको अंग्रेजो ने भारत  का केंद्र जाहिर किया। उसी जगह पर पत्थर का एक स्तम्भ बनवाया गया , जिसको ” refrence point ” के तौर पर रखा गया और इसी को केंद्र मानकर भारत के सभी शहरों का अंतर मापने का काम शुरू हुआ।  यह स्तम्भ आज भी मौजूद  है।  इस स्तम्भ के बगल में चार घोड़ों की एक मूर्ति है।  

चुनाव के दौरान मतदाताओं की ऊँगली पर लगाया हुआ स्याही का दाग लम्बे दिनों तक उंगलियों से क्यों नहीं जाता ? इसके लिए iq level की यह पूरी पोस्ट पढ़े 

      अंग्रेजी में indelible ink कही जानेवाली स्याही भारत में मैसूर पेंट्स एंड वॉर्निश लिमिटेड कंपनी उत्पाद करती है ,  जिसकी मलिकी कर्णाटक सरकारकी है। शाही बनाने का ख़ास फॉर्म्युला दिल्ली में आई हुई नेशनल फिज़िकल लेबोरेटरी द्वारा तैयार किया गया है। यह फार्मूला बेहद खानगी है। फिर भी इसमें मुख्या पदार्थ सिल्वर नाइट्रेट है जो  23% उपयोग होता है।  यह कंपनी की शुरुआत 1937 में हुई थी और इसका मुख्य व्यापर तो पेंट्स और वॉर्निश बनाने का है। परन्तु चुनाव के दौरान करीब 80 आदमियों को चुनाव की स्याही यानी indelible ink बनाने के लिए लगा दिया जाता है।  चुनाव केन्द्रो के लिए वह लोग 5.5 मिलीमीटर (350 मतदारो के लिए  ) और 7. 5 मिलीमीटर की ( 500 मतदारो के लिए ) कूल 17 लाख छोटी छोटी बोतले तैयार करते है। इसकी सबसे ज्यादा खपत अंडमान – निकोबार के पोर्ट बलेर में होता है। सिल्वर नाइट्रेट थोड़ा महंगा पदार्थ है, इसलिए कुछ साल पहले नेशनल फिज़िकल लेबोरेटरीने ऐसी फॉर्म्युला तैयार की जिसमे सिल्वर नॉट्रेट का इस्तेमाल 23% के बदले 13% करे तो भी मतदाता की ऊँगली पर स्याही कई दिनों तक रहेगी। 

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मतदाता की ऊँगली या नाख़ून में लम्बे समय तक धब्बा रहने का कारन 


     indelible ink का धब्बा  लम्बे समय तक रहता है इसका कारण यह है की स्याही जो है  , वह नाख़ून या फिर ऊँगली के ऊपर ही नहीं बल्कि यह स्याही चमड़ी के निचले स्तर तक चली जाती है और हम साबुन से हाथ साफ़ करते है फिर भी वह धब्बा नहीं  जाता क्योकि चमड़ी के निचले स्तर  तक साबुन की झाग नहीं पहुंच सकती। इसीलिए करीबन 20 दिनों तक स्याही का धब्बा रहता है  कई दिन बीतने के बाद धीरे धीरे यह स्याही भी निकल जाती है।  ऐसा ही नाख़ून में भी  होता है , स्याही वाला नाख़ून क्रमशः बढ़ रहा होता है , और बढ़ने के बाद हम लोग नेल कटर से उसको काट डालते है 


भारत की मालगाड़ी का रेलवे इंजन औसत कितना  भार उठा सकता है?

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      रेलवे के सभी इंजन एक समान नहीं होते है यह बात तो आप सभी को मालूम है ।   माल की धुलाई के लिए 2,22,147 वेगन के साथ भारतीय रेलवे के  पास इलेक्ट्रिक और डीजल मिलाकर कूल 7566 इंजन है।  सबसे शक्तिशाली इंजन चितरंजन लोकोमोटिव ने बनाये है जो 6000 हार्सपावर के है।  प्रत्येक की वहन क्षमता 5000 मीट्रिक टन है , जिसकी पड़तर किम्मत 14 करोड़ रुपये है।  अब रेलवे मंत्रालय 6000 मेट्रिक टन माल भरी हुई गुड्ज़ ट्रैन को  joint कर सके ऐसे 9000 हार्सपावर वाले 200 इंजन जिसमे एक इंजन की किम्मत 20 करोड़ है उसे आयत कर रही है।  इसमें से 40 इंजन जापान से होंगे बाकि इंजन अलग अलग देशो से निर्यात किये जाएंगे।  

बाली, इंडोनेशिया में हिंदू बहुसंख्यक हैं ,  आइए जानते हैं  iq level  की इस पोस्ट में हिंदू धर्म कब और कैसे इंडोनेशिया पहुंचा 


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     इंडोनेशिया लगभग 13,500 द्वीपों का देश है।   इसके चार मुख्य द्वीप बोर्नियो, सुमात्रा, सुलावेसी और जावा हैं , जिसकी तुलना में बाली 5561 वर्ग किलोमीटर के साथ एक बहुत छोटा द्वीप है।  आज से लगभग पंद्रह सौ साल पहले, भारतीय सगरखेड़ु  दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार करते थे , उन्होंने वह  लंबे समय तक हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति को प्रभावित किया। और वह के स्थानीय लोगों ने भी हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को अपनाया। ई.स.700 में मातरम नामके पहले हिन्दू साम्राज्य की स्थापना जावा टापू पर की गई , लेकि थोड़े समय के बाद बौद्ध धर्मी राजा शैलेन्द्र जावा का सम्राट बन गया।  और जावा को उसने बौद्ध राज्य घोषित किया। इसीलिए  जावा में निवास कर रहे कई हिन्दू लोगों ने अपने  नजदीक में आये हुए टापू बलि में शरण ली।  बाली में 100% हिन्दू प्रजा थी और वहा का राजा उदयन प्रजावत्सल राजा था। पन्द्रवीं सदी  के दरम्यान जब सुमात्रा और जावा पर मुस्लिमो का कब्ज़ा हो गया तब उन दोनों टापू के कई हिंदी लोगो ने  बाली  आश्रय लिया था।  

इंडोनेसिया में आज के हिन्दू की परिस्थिति 

इस वख्त इंडोनेशिया में हिन्दू बस्ती 72 लाख जितनी है , लेकिन हिन्दू की बहुमति केवल बाली में है जो 93% है। रामायण के नृत्य नाटक विशेष रूप से बाली में जाना जाता है  और यहाँ  स्कूल में बच्चो को मार्कण्डेय , भरद्वाज ,अगस्त और ऋषिमुनिओ के पाठ पढ़ाये  जाते है।  जो आज भारत जैसे देश में बिलकुल नाम शेष हो गए है।  आज भी बाली में हर साल सीतास्वयंवर , रामके वनवास , भरतमिलाप ,सीता अपहरण , जटा युवध ,  लंकादहन ,राम-रावण युद्ध इन सभी प्रसंगो के साथ रामायण के नाटक किए जाते है।  बाली का रामायण वाल्मीकि रामायण से अलग है।   बाली के रामायण में भरत को राम का सागा भाई बताया गया है , और  इसमें एक रोचक बात यह भी है की इसमें कैकई का पात्र  ही नहीं है।  यहाँ अभी भी पारम्परिक रीत से धोती पहनने का ही रिवाज़ है। यहाँ पर दिनमे तीन बार गायत्रीमंत्र बोलने का रिवाज़ है।  कई रेडिओ स्टेशन तो सूर्यपूजा के मंत्रोचार भी प्रसारित करते है।  यहाँ पर न्योपि नामक एक दिन आता है उस दिन सबको मौन रहना होता है , यह दिन साल में एक बार आता है।  यहाँ पर टेलेविज़न ,विमान सेवा ,और ट्रैफिक सभी सुबह के 6 वजे से दूसरे दिन के सुबह 6 बजे तक बंध रहते है। विदेशों में हिंदू धर्म का इतना गहरा प्रभाव वास्तव में आश्चर्यजनक है। 








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