coronavirus migration in india – रिवर्स माइग्रेशन का संकट

coronavirus lockdown in india

coronavirus lockdown india

corona virus की चैन तोड़ने के लिए भारत के पास लोकडाउन एकमात्र रास्ता ह . लेकिन इस के बाद बहुत बड़ी संख्या में होने वाले रिवर्स माइग्रेशन बहुत से नए संकटो को जन्म देगा। जिन से निपटने के लिए भारत के पास कोई योजना , कोई सर्वे या कोई ब्लूप्रिंट नहीं है। भयावह बेरोजगारी का यह संकट देश के अंदर तो होगा ही , देश के बहार से भी आएगा।

दुर्लभ जानकारी : ड्रेगन ब्लड ट्री के बारे में

देशव्यापी लोकडाउन खत्म हुए कई दिन हो गए है 24 मार्च से ही लाखो की संख्या में बड़े शहरो में काम कर रहे प्रवासी, यानि बिहार , उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , ओडिशा के मजदूरों ने अपने गांव लौटने का फैसला कर लिया था और वे निकल पड़े थे। जिस मोदी सरकार को गरूर था की जनता उस के हर बेदर्दीभरे फैसले को देवता का हुक्म मान कर सिरआंखों पर ले लेती है, भौचक्की रह गई की ट्रैन और बस नहीं, तो पैदल ही सेंकडो नहीं , हजारो नहीं , लाखो प्रवासी मजदुर अपने अपने गावो की और चल दिए।

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भाजपा सरकार ने पुलिस से पूरा बंदोबस्त किया मगर मजदूरों को शहरो से इतनी नफरत हो गई की न तो उन के कान किसी घोसणा को सुनने के लिए तैयार हुए और न उन के पैर रुकने के लिए , उन्होंने बिलकुल उसी तरह शहरो से अपने घरो की और भागना जारी रखा जैसे बाढ़ आने पर चूहे अपने बिलो से निकलकर सुरक्षित स्थानों की और भागते है। दरअसल, सरकार ने बिना किसी तयारी के , बिना किसी योजना के आननफानन नोटबंदी की तरह लोकडाउन का एलान कर दिया। उसके बाद जो उसने लोगो की भागभाग देखि तो कुछ रिलीफ सेंटर खोले और वहा पर गरीब लोगो को खाना खिलाने का पूरा इंतज़ाम किया गया। उनकी वहां पहरेदारी की , इलाज के नाम पर एम्ब्युलन्स कड़ी की पर उनसे ज्यादा बेरहम डंडो से लेस पुलिस वालो से भरी वैने खड़ी कर दी की कही ये भाग न जाए।

देशभर ने इन मजदूरों की पिटाई के सीन तब तक देखे जब तक तब्लीगी जमात के मामले ने उछाल कर ध्यान नहीं भटकाया। यह साफ़ है की हिन्दुमुस्लिम विवाद वर्णव्यवस्था के हामी टीवी एंकरों व् उनके चेनलो की दैन है जो सरकार को मजदूरों द्वारा परोसी जिल्लत से बचाना चाह रहे थे। सरकार की दुनियाभर में नाक कटी , शायद मोदी ने इसी बात से नाराज़ हो कर सारे मंत्रियो से काम छीन लिए , तमाम मुख्यमंत्रीओ को फटकारा। अप्रेल के आखिरी दिनों में ही प्रवासी मजदूरों को उनके गृहराज्य वापस पहुंचाने के लिए बसे भेजी जानी शुरू हो गई। कई राज्य दूसरे राज्यों में अपनी बसे भेजने लगे ताकि वहां फसे प्रवासी मजदूर और कामगार अपने राज्यों में अपने घरो को वापस लौट सके। उत्तर प्रदेश ने कई राज्यों में अपनी बसे भेजी है. मध्य प्रदेश ने महाराष्ट्र को लिखा की वहां के लोगो को वापस आपने दे।

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बिहार के मुख्यमंत्री इन में ख़ास निकले जो इन गरीबो को पलने की मुसीबत पालना ही नहीं चाहते और बारबार स्वास्थ्य का नाम ले कर इस जिम्मेदारी से परे हटते रहे. दरअसल, सुशाशन बाबू नितीश कुमार सत्ता के मोह में नरेंद्र मोदी को नाराज़ नहीं करना चाहते। छत्तीसगढ़ ने कोटा में बसे भेज कर डेढ़ हजार छात्रों को बुलवा लिया।जम्मूकश्मीर ने भी अपने लोगो को अलगलग राज्यों से बुलाना शुरू कर दिया। हालाँकि जितनी बसे भेजी गई और अभी भी जो भेजी जा रही है , उन के मुकाबले में प्रवासी मजदूरों कामगारों की तादाद कही ज्यादा है यानि कई लाख हो सकते है एकदो करोड़ से भी ज्यादा हो सकते है हालाँकि , ज्यादातर प्रवासी तो लोकडाउन के दौरान ही विभिन्न माध्यमों से चोरीछिपे अपनेअपने राज्य पहुंच चुके है

आखिर इन मजदूरों को लौटने देने में कठनाई क्या थी ? वे अपने गांव ही जा रहे थे , भोपाल , पटना या लखनऊ में तो डेरा नहीं ज़माने वाले थे. इतना समाज ले की तानाशाह चीन ने वूहान , जहाँ से corona virus शुरू हुआ , 50 लाख मजदूरों को तीन दिन दिए थे की वे तुरंत अपने शहरो में चले जाए.मगर भारत सरकार ने ऐसी अनुमति नहीं दी। भारत में मुंबई , कोलकाता , हैदराबाद , चेन्नई , बेंगलुरु , दिल्ली आदि में कोई 6 करोड़ बाहरी मजदुर है , जिनमे से 33 प्रतिशत उत्तर प्रदेश से है , 15 प्रतिशत बिहार से जबकि 6 प्रतिशत राजस्थान से है।

coronavirus world map

दिल्ली की आबादी में 45 – 50 प्रतिशत बाहरी है और मुंबई में भी ये बाहरी लोग 50 – 60 प्रतिशत है , पर लोकडाउन के बाद ये सब नहीं लौट रहे थे , वे ही लौटने को उतावले थे जिन के पास न रहने के लिए मकान थे , न पेट भरने का राशन और न कोई काम। इन में से ज्यादातर इन राज्यों के गावो से आए है.ये भवन निर्माण , फैक्टरियां , होटलो , परिवहन , ट्रको , स्वास्थ्य , सेवाओं से काम करते है जहा हुनर की जरुरत कम होती है। प्रवासी मजदुर इस लिए लौट रहे है क्योकि उन्हें एहसास हो गया की वे तो देश की गायो से भी बदतर है।

खुले आसमान के निचे आधापेट खाना देकर इन्हे इसलिए रोका जा रहा था की सेकड़ो फ़ैक्टरिया और व्यापर सस्ते मजदूरों की कमी की वजह से बंद न हो जाये। सरकार इन मजदूरों को शहरो में भूखा रखने को उतावली है क्योकि फ़ैक्टरिया इन के बिना नहीं चल सकती। मजदुर वर्ग को यह अहसास हो गया की अगर वे अपने घरो को नहीं लौटे तो इन्ही महानगरों में उन्हें मजदुर से भिखारी बना दिया जाएगा जो दो रोटी पाने के लिए मिलो लम्बी लाइनों में अपनी बरी का इंतज़ार करता तपती धुप में सारा दिन बैठा रहेगा। दिल्ली के आईएसबीटी और मुंबई के बांद्रा स्टेशनों पर जो हजारो लाखो की भीड़ उमड़ी , उस के दिल में यही डर समाया हुआ था

भूख ले लेगी जान

दलित जाती का अम्बर कुमार अपने २ मासूम बच्चों और बीवी के साथ दिल्ली से आगरा 200 किलोमीटर का रास्ता पैदल तय कर के अपने गांव पंहुचा था। दिल्ली में जिस फैक्ट्री में वह काम करता था उस का परिवार उसी फैक्ट्री के परिसर में रहता था , मगर फैक्ट्री बंद कर मालिक ने उनको वह से बहार कर दिया। ऐसे में लोकडाउन के बीच अंबर कुमार अपने बच्चो को कंधे पर लाद कर बीवी और सामान के साथ कैसे इतना लम्बा सफर पैदल तय करके अपने गांव पंहुचा , उस का दिल ही जनता है अब उस गांव में या अगर शहर में जाकर कुछ काम ढूंढना पड़ेगा। दिल्ली वापस आने के नाम पर अब वह कान पकड़ता है।

coronavirus आपदा प्रबंधन में नाकाम सरकार

कोरोना वायरस की चैन तोड़ने के लिए भारत के पास लोकडाउन एक मात्र रास्ता है। लेकिन उसके बाद maigration नए संकटो को जन्म देगा। इसके चलते आनेवाले दिनों में लोगो के सामने बेरोजगारी उत्पन्न होगी। सरकार इस समस्या को निपटने के लिए योजना बना रही है। रिसर्च या सर्वे अभी तक शुरू नहीं हुआ है। आने वाले समय में बेरोजगारों की कितनी बड़ी फ़ौज कड़ी होगी ? सरकार के पास कोई ब्लूप्रिंट नहीं है की किस तरह इस आने वाली परेशानी से देश उभरेगा।

coronavirus lockdaun की वजह से किरायेदार ज्यादा परेशान है

दिल्ली के सदर बाजार में संतोष की फास्टफूड की छोटी सी दुकान है दूकान का किराया 15 हजार रुपये महीना है। लोकडाउन में दुकान तो बंद है मगर दुकानमालिक किराया पूरा वसूल रहा है। संतोष की साडी बचत अपने 2 वर्करों की तनख्वाह देने , दुकान का किराया चूकने और घर का खर्च चलने में ख़त्म हो चुकी है। उसके के बैंक अकाउंट में मात्र 6 हजार रुपये बचे है जो महीना ख़त्म होते होते ख़त्म हो जाएगी। अब वह दुकान दुबारा खोलेगा तो उसे सब कुछ नए सिरे से शुरू करना होगा। दूकान खोलते ही दूकान मालिक उसके सर पर बेथ जायेगा। बिजली का बिल भरना होगा , दूकान में फिर से सारा खाने[पिने का सामन भरना होगा।

दूकान खोलने के बाद उसे लम्बे समय तक इंतज़ार करना होगा ! क्योकि इस इलाके में फास्टफूड के शौकीन ज्यादातर छात्रछात्रो , जो कोरोना के डर से लोकडाउन की शुरुआत में ही अपने जिल्लो को लौट गए। उनकी वापसी भी जल्दी नहीं होगी। ऐसे में बिना पूँजी के संतोष पहले वाली स्थिति में कैसे पहुंचेगा। यह सोचकर उसका ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है। और यदि उसके कारीगर गांव से नहीं आये तो उसे नए कारीगर खोजने पड़ेंगे।

coronavirus की वजह से गुजरात के सबसे बड़े बोरवेल बिज़नेस वाले गांव का का काम ठप कैसे हुआ जानिए

गुजरात राज्य के राजकोट जिले से करीबन 30 किलोमीटर दूर भूपगढ़ नाम का एक बड़ा गांव है इस गांव में सभी लोग बोरवेल का बिजनेस करते है इस गावं के पास करीबन 900 के आसपास बोरवेल मशीन है जो यह लोग पुरे गुजरात और अलग अलग राज्यों में सर्विस देते है जिनमे यह लोग गवर्नमेंट के पानी के बोर , साइल टेस्टिंग , अर्थिंग , ongc ,पायलिंग का काम , सोलर के बोर , और ऑगर के बोर करते है। वहां के कई लोग तो गुजरात के अहमदाबाद , सूरत , बड़ौदा , आनंद जैसे बड़े शहरो में स्थायी हो चुके है इन बोरवेल के धंधार्थियो के लिए काम करने का अच्छा वक्त गर्मी का होता है क्योकि इस समय में उनके पास काम और आर्डर ज्यादा आते है।

हमने सूरत में रहने वाले शैलेशसिंह गोहिल जो गोपीनाथजी बोरवेल के नाम से अपनी कंपनी चला रहे है उनसे बात की उनका कहना है की हमारे यहाँ गर्मी में ज्यादा काम निकलता है और बारिश में हमारा काम पूरा बंद रहता है। और उन्होंने कहा की अब सरकार ने गर्मी में लोकडाउन डाल दिया और बारिश में मशीन बंद रहती इसलिए पुरे बोरवेल वालो का यह साल पूरा ही निष्फल गया। बारिश में सरकार ने अनलॉक किया मगर अब बारिश में मशीन चल नहीं सकती। भूपगढ़ गांव में जो मशीन है उनमे से एक मशीन की आमदनी 5 लाख भी गिने तो 900 मशीन की आमदनी आप ही हिसाब कर लेना इनको कितना नुकसान हुआ होगा!

भूपगढ़ के बारे में अत्याधिक जानकारी

आपकी जानकारी के लिए बता दे की इस गांव के पास मिटटी काटने वाले मशीन 900 के आसपास है जबकि पत्थर काटने वाले करीबन 10 मशीन है मिट्टीवाले मशीन की तरह ही पत्थर वाले dth बाले मशीन का भी यही हाल है क्योकि यह सभी मशीन oil and natural gas company – ongc में ही वर्क करते है और इस साल corona की वजह से ongc भी बंद है।

बाहरी कामगारों को रोजगार संकट

हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका में ग्रीन कार्ड यानि पर्मनंट रेजिडेंस के लिए जो लोग अप्लाई करने वाले थे। उन पर 2 महीने के लिए रोक लगा दी। ऐसे में जो भारतीय अमेरिका जाकर बसना चाहते थे फ़िलहाल वे नहीं जा पाएंगे। इनमे से अधिकांश अब विदेश जाने का ख्याल भी अब दिल से निकाल देंगे। वही , अमेरिका में चल रही चीन की मशहूर होटल ‘ ओयो ‘ द्वारा भारतीय कर्मचारियों को 4 महीने बिना वेतन के छुट्टी पर भेजे जाने की खबर आ रही है। बिना पैसे के इनमे से कितने लोग अमेरिका जैसे देसो में सर्वाइव क्र सकते है ?

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