amazing facts in hindi-आश्चर्यजनक तथ्य हिंदी में

amazing facts in hindi-आश्चर्यजनक तथ्य हिंदी में

What is the oyster stuck on the side of the ship or under the ship ? आइए जानते है amazing facts की आज की इस पोस्ट में 

इस सीप को अंग्रेजी में बार्निकाल कहते है 

आइए जानते है बार्निकाल अथवा तो सीप के बारे मे

           सामान्य रूप से सीप समुद्री भेखड के साथ अपने छिटक पदार्थ के जरिए चिपकी हुई रहती है . सरेरस  देखे तो 1 किलोमीटर के दायरे में समुद्र में 125 करोड़ सीप चिपकी हुई होती है। समुद्र आंतरिक प्रवाह या भर्ती के साथ में जो खोराक आता है  उसके पकड़ लेती है। और स्थिर भेखड से अच्छा उसे प्रवासी मालवाहक जहाज लगता है ,क्योकि समुद्र में जैसे जैसे जहाज आगे  वैसे वैसे सीप को खोराक मिलती जाएगी। सीप कुछ ज्यादा ही चिपकू होती है। यह सीप एक बार जहाज के निचले हिस्से में चिपक जाती है तो फिर निकलने का नाम ही नहीं लेती। इसकी वजह से जहाज की गति में घर्षण उत्पन्न होता है  ,इसकी वजह जहाज की स्पीड में 9. 25 किलोमीटर तक की गिरावट आ सकती है| जिसकी वजह से अधिकतम गति के लिए इंजन के ऊपर दबाव बढ़ता है। बहुत ही बड़े जहाज में लाखो की तादात में जब यह दरिआई सीप चिपक जाती है तो 12 दिनों के अंतर् काटने में उस जहाज को 2640 टन ज्यादा ईंधन की जरुरत पड़ती है। इस समस्या को हल करने के लिए कई महीने बीत जाने के बाद जहाज  को शुष्क गोदी यानि की कोई शुष्क जगह पर लाया जाता है और फिर जहाज को साफ़ किया  जाता है। कई बार जहाज को रासायनिक पैन्ट से भी रंगा जाता है , परन्तु ऐसे करने से भी समुद्र में रहे दूसरे जीवो के लिए खतरा साबित हो सकता है। 

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जहाज के किनारे या जहाज के निचे चिपका हुआ सीप 


    इसी तरह जहाजों की माफक व्हेल मछली को भी  सीप से  यातने मिलती है।  यह सीप व्हेल मछली के पेट ,मस्तक ,पूँछ और कभी कभी होठ पर भी चिपक जाती है।  और लम्बे समय तक चिपकी रहती है जिसकी वजह से व्हेल मछली भी परेशां हो जाती है और इस समस्या से निपटने के लिए कई बड़ी नदी  में चली जाती है जैसे की आफ्रिका की ज़ेर नदी। व्हेल    चिपकी हुई सीप को  नदियों का मीठा पानी  बाज़ नहीं आता और खरे पानी के समुद्र के क्षार के आभाव से वे मर  जाती है और व्हेल से दूर हो जाती  है।  

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व्हेल मछली से चिपकी हुई सीप की तस्वीर देखे 

मैन्ग्रोव  जाडियो के बारे में जानकारी amazing facts द्वारा 

मैन्ग्रोव की रचना ही कुछ अलग प्रकार की है  उष्णकटिबंधी विस्तारो में 70 % दरियाई धरती पर 110 जात की मैनग्रोव की झाड़ियां मौजूद है। 

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मैन्ग्रोव की झाडिया 


           मैन्ग्रोव की झाड़ियों को हम एक ही बार में देखकर पहचान सकते है। मैन्ग्रोव के कांटेदार जड़े पूरी तरह से जमीन में खुपि हुई नहीं होती है। सभी जड़े थोड़ी सी बहार होती है। इस हालत  में वह समुद्र में बाह रहे काँप को रोकती है और जमीं में  होनेवाला कटाव को रोकती है, इतना ही नहीं समुद्रतट पर आनेवाली लहरों को भी रोकती है। समुद्रशृष्टि को बचाये रखने में मैन्ग्रोव का महत्वपूर्ण योगदान है। समुद्रतट पर फैला हुआ मैन्ग्रोव का  जंगल  1 एकड़ में 4000 किलो जितना सेंद्रिय पदार्थ पानी में गिराता है ,जिसमे तक़रीबन फल ,  पत्ते होते है। जिसको अपना आहार बनाकर कई छोटे छोटे जीव अपना पेट भरते है। और यही जिव समुद्री बेक्टेरिया के लिए खोराक है। यहाँ से खोराक की एक छोटी  सी चैन सुरु होती है जो बड़े समुद्री जीवो को भी इस चैन में जोड़ती है। इस तरह क़ुदरतने मैन्ग्रोव को समुद्रतट पर उगाकर उसने समुद्रीजोवो और धरती के बीच मध्यस्थता राखी हुई है। इसलिए पर्यावरण की दृष्टि से मैन्ग्रोव तटीय इलाको के  लिए बहुत ही आवश्यक है। 

लाफिंग गैस सूंघने के बाद व्यक्ति हसने क्यों लगता है ? जानिए amazing facts की इस पोस्ट में। 

लाफिंग गैस के बारे में जानकारी ; 

                     लाफिंग गैस यानि की नाइट्रस ऑक्साइड नामक वायु। जिसके ऊपर सबसे  पहले प्रयोग ब्रिटिश  रसायनज्ञ सर हम्फ्री देवीदने किया था। दिसंबर 17 , 1778 के दिन हम्फ्री डेवी का जन्म हुआ था और उस दिको यह नाइट्रस ऑक्साइड सभी के लिए एक नया वायु ही था  कोई भी इससे परिचित नहीं था।  एक बार डेवी ने प्रयोगशाला में ऐमोनिया नाइट्रेट को 200′ सेल्सियस तक गरम कर के नाइट्रस ऑक्साइड बनाया। और वायु की गंध को परखने के लिए उसने पात्र की जो नाली थी वः अपने नाक के पास रखी और उसके बाद एक लम्बी सांस ली और उसे सूंघते रहे परिणाम यह हुआ की उस वायु को ज्यादा सूंघने  से वह बेभान हो गए। और फिर दूसरे दिन फिर से उन्होंने  उस  का परिक्षण किया।  इस बार उन्होंने थोड़ी देखभाल रखते हुए और ओवरडोईज न हो जाये उसका ध्यान रखते हुए पर्याप्त मात्रा में ही वायु को नाक से सुंघा ,  और परिणाम यह आया की उन्हें कल के  दिन से कुछ अलग ही वायु लगा और डेवी अपने होश खोकर  हसने लगे। और उन्होंने मार्क किया की वह वायु डोज़ सूंघने के बाद  उसकी शारीरिक संवेदना भी घटने लगी थी।  और  यहीं से उन्होंने इस गैस का नाम रख दिया : लाफिंग गैस 

 

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लाफिंग गैस कैसे मानवजात तक पहुंचा और कैसे उसका उपयोग हुआ यह भी पढ़िए 

सन 1800 में हम्फ्री डेविड ने अपनी पहचान वाले सभी तबीबों को अपने अविष्कार के बारे में बताया और मरीजों के ऊपर ऑपरेशन करने से पहले उन्हें लाफिंग गैस देने को कहा जिससे दर्दी को दर्द का एहसास न हो लेकिन दुर्भाग्य से हम्फ्री के इस निवेदन को एक भी तबीब ने स्वीकारा नहीं। और जोक तो यह बनकर रह गया की लाफिंग गैस के अविष्कार के 40 साल बाद भी यह गैस मात्र जादू के  सो में लोगो को हँसाने के  लिए काम आने लगा। आखिर में  1844 में होरेस वेल्स नामक अमेरिकन दन्तचिकित्स्क ने उसके दर्दी को दांत निकलने से पहले लाफिंग गैस का इस्तेमाल किया और यह कारगर रहा  क्योकि यह डोज देने के बाद दर्दी को दर्द का एहसास भी नहीं हुआ। नाइट्रस ऑक्साइड बिना रंग का है और यह वायु चोक्कस मात्रा में  ऑक्सीज़न के साथ देने पर मगज के  ज्ञानकोशों के  केंद्र जो हालां चलन करता है उसको ऑक्सीजन नहीं मिलता है नाइट्रस ऑक्साइड के साथ ऑक्सीजन होने के बाद भी केंद्र उसको ग्रहण नहीं कर सकता। हमारे स्नायु अमुक हद तक बेकाबू हो जाते है उत्तेजना के साथ दर्दी बेकाबू बनकर हंसने लगता है। इस जात का रिएक्शन हमें देखने को नहीं मिलता क्योकि एनेस्थेसिया देने वाला  डॉक्टर एक नियत  मात्रा में ही डोज देता है। यह काम बहुत ही जोखमी है। नाइट्रस ऑक्साइड और ऑक्सीजन के बीच यदि तालमेल न रहे तो कुछ भी हो सकता है। 

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